GERMANY BADE FAREWELL TO ANJELA

With six minutes of warm applause, on the streets, balconies, windows, the whole Country applauded for 6 minutes – spectacular example of leadership and defense of humanity, chapeaux!

The Germans elected her to lead them, and she led 80 million Germans for 18 years with competence, skill, dedication and sincerity. She did not utter nonsense. She did not appear in the alleys of Berlin to be photographed. She was dubbed “The Lady of the World” and who was described as the equivalent of six million men.

During these eighteen years of her leadership of the authority in her Country, no transgressions were recorded against her. She did not assign any of her relatives to a government post. She did not claim that she was the maker of glories. She did not get millions in payment, nor did anyone cheer her performance, she did not receive charters and pledges, she did not fight those who preceded her.

Yesterday, Merkel left the party leadership position and handed it over to those after her, and Germany and its German people are in the best condition ever.

The reaction of the Germans was unprecedented in the history of the Country. The entire population went out to the balconies of their houses and clapped for her spontaneously for 6 continuous minutes. A standing ovation nationwide.

Germany stood as one body bidding farewell to their leader, a chemical physicist who was not tempted by the fashion or the lights and did not buy real estate, cars, yachts and private planes, knowing that she is from former East Germany.

She left her post after leaving Germany at the top. She left and her relatives did not claim advantage. Eighteen years and she never changed her wardrobe. God be upon this silent leader.

At a press conference, a female Journalist asked Merkel: We notice that you’re wearing the same suit, don’t you have any other?” She replied: “I am a government employee and not a model.”

At another press conference, they asked her: Do you have housemaids who clean your house, prepare your meals and so on? Her answer was: “No, I do not have servants and I do not need them. My husband and I do this work at home every day.

Then another journalist asked: Who is washing the clothes, you or your husband? Her answer: “I arrange the clothes, and my husband is the one who operates the washing machine, and it is usually at night, because electricity is available and there is no pressure on it, and the most important thing is to take into the account the possible inconvenience for the neighbours, thankfully the wall separating our apartment from the neighbours is thick.” She said to them, “I expected you to ask me about the successes and failures in our work in the government!”

Mrs. Merkel lives in a normal apartment like any other citizen. She lived in this apartment before being elected Chancellor of Germany. She did not leave it and does not own a villa, servants, pools or gardens.

Merkel, the now former Chancellor of Germany, the largest economy in Europe!

नोट: सामान्यतः मैं सोशल मीडिया पोस्ट को कॉपीपेस्ट अथवा फारवर्ड करने में विश्वास नही नही करता पर कभी कभी कोई पोस्ट ऐसी मिल जाती है जिसे दूसरों से साझा करने का लोभ संवरण कर पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसी ही एक पोस्ट जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्कल, जिन्होंने १८ वर्षों के सफल शासन के बाद सत्ता छोड़ी है, के बारे में मिली है। यद्यपि ये मुझे एक WhatsApp पोस्ट से मिली थी पर थोड़ी तलाश के बाद मुझे इसका उद्गम भी मिल गया। The Island अख़बार के पेपर (epaper.island.lk) में 20.07.21 को ये लेख ब्रिगेडियर रंजन डी सिल्वा के नाम से प्रकाशित हुआ था।.

Note: Generally I don’t believe in copy pasting or forwarding on social media but sometimes I get such posts that I can’t resist to share it with others. It was a post regarding Angela Merkel, who left the post of Chancellor of Germany after successful reign of 18 years. Though I got this post first through a WhatsApp message but after some endeavour I got the original article which was published in epaper.island.lk on 20.07.21. in the name of Brigadier Ranjan de silva.

हिन्दी अनुवाद:

समूचे देश ने नेतृत्व के शानदार उदाहरण और मानवता की सेवा के लिए सड़कों,खिड़कियों और बारजों पर खड़े होकर लगातार छः मिनट तक ताली बजाकर उनका अभिवादन किया।

जर्मनी वसियों ने उन्हें अपना नेतृत्व करने के लिये चुना और उन्होंने 8करोड़ जर्मनी वसियों का अट्ठारह वर्ष तक पूरी योग्यता, कौशल,समर्पण और सच्चाई के साथ उनका नेतृत्व किया।उन्होंने कोरी बकवास नही की, बर्लिन की सड़कों पर फ़ोटो नही खिंचवाये। उनको “The Lady of the World” कहा गया और उन्हें साठ लाख पुरुषों के बराबर आंका गया।

उनके अठारह वर्षों के नेतृत्व और शासन में किसी प्रकार के उल्लंघन का मामला नही आया।उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार को कोई सरकारी पद नही दिया। उन्होंने कभी ये दावा नही किया कि उन्होंने देश को गौरव प्रदान किया।उन्होंने लाखों/करोड़ों में मेहनताना नही प्राप्त किया, न उनके प्रदर्शन के लिए क़सीदे पढ़े गये, उन्होंने कोई विशेषाधिकार ही लिये और उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों से कोई वैर नही साधा।

उन्होंने दल के नेता पद को सहजता से अपने बाद की पीढ़ी के हाथों में सौंप दिया जबकि जर्मनी और जर्मनी वासी बहुत बेहतर स्थिति में हैं।इस अवसर पर जर्मनी के नागरिकों की प्रतिक्रिया जर्मनी के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। सारे देशवासी अपने घरों के बारजों पर खड़े होकर उनके लिए छः मिनट तक तालियाँ बजाते रहे। पूरे देश ने खड़े होकर उनका अभिनंदन किया।

पूरी जर्मनी ने एकजुट होकर अपने नेता की विदाई की। एक रासायनिक भौतिक विज्ञानी जिसे न फ़ैशन का ललच था, न जगमगाती रोशनियों का बल्कि जिन्होंने हमेशा याद रखा कि वो पूर्वी जर्मनी से हैं। न उन्होंने कोई स्थाई सम्पत्ति ख़रीदी, न कोई कार, न कोई समुद्री जहाज़ या प्राइवेट प्लेन।

उन्होंने अपना पद उस समय छोड़ा जब जर्मनी अपने शिखर पर था। उन्होंने अपना पद छोड़ दिया पर उनके रिश्तेदारों ने किसी लाभ की माँग नही की। इन अठारह वर्षों में उन्होंने अपने कपड़ों की आलमारी तक नही बदली।

एक पत्रकार सम्मेलन के दौरान एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा की, “आप वर्षों से एक ही सूट पहनती आ रही हैं, क्या आपके पास दूसरा सूट नही है?” उनका जवाब था कि वो सरकारी नौकर हैं कोई मॉडल नहीं।

एक अन्य पत्रकार सम्मेलन में उनसे पूछा गया कि क्या घर के कामों के लिए उनके यहाँ कोई नौकरानी है। उनका जवाब था कि,” नही, हमारे घर में नौकर नहीं हैं और हमें उनकी ज़रूरत भी नही है। मैं और मेरे पति घर का सारा काम स्वयं देखते हैं।”

एक अन्य पत्रकार ने पूछा कि ,” आपके घर में कपड़े कौन धोता है,आप या आपके पति? उनका उत्तर था कि, मैं सब इकट्ठा करती हूँ और मशीन चलाने का काम मेरे पति करते हैं। और ये काम हम सामान्यतः रात में करते हैं क्यूँकि तब बिजली उपलब्ध रहती है और उस पर अधिक लोड नही होता।हमें पड़ोसियों की सुविधा का भी ध्यान रखना पड़ता है।ग़नीमत है कि हमारे और उनके बीच की दीवार पर्याप्त मोटी है।” उन्होंने पत्रकारों से कहा कि, “ वो तो सरकार की सफलताओं और असफलताओं पर सवालों की अपेक्षा कर रही थीं।”

श्रीमती मर्क़ेल एक सामान्य से अपार्टमेंट में रहती है जैसे कोई अन्य नागरिक। इस घर में वो चांसेलर बनने के पहले से रहती हैं।उन्होंने इस घर को नही छोड़ा है और उनके पास कोई विला, नौकर, तरण ताल या बगीचे नही हैं।

मर्क़ेल ने जर्मनी को यूरोप की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में छोड़ा है।

नोट: अनुवाद का प्रयास मेरे द्वारा किया गया है।

किसान आंदोलन

कुछ दिन पूर्व मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी कि मैं किसानों के पक्ष में हूँ पर इस प्रकार के आंदोलन के साथ नही हूँ। फिर ये सवाल भी उठ खड़ा होता है कि आंदोलन न करें तो अपनी बात कैसे सरकार तक पहुंचाएं। दरअसल 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से विपक्षी दलों के समक्ष अस्तित्व को बनाये रखने का संकट खड़ा हो गया है तो हर मुद्दे पर वो एकजुट होकर सरकार का विरोध करने लगते हैं। यहीं सब बात खराब हो जाती है जिससे सत्ताधारी दल को भी राजनीति करने की स्वतंत्रता मिल जाती है और मूल मुद्दा हाशिये पर चला जाता है।
दूसरे अधिकतर समाचार चैनल या अखबार भी मूल मुद्दे का विश्लेषण करके सही और गलत को निरपेक्ष भाव से जनता के समक्ष रखने के बजाय सतही बातों पर ज्यादा जोर देते हैं जिससे उनको TRP मिलती हो। ये स्थिति अत्यंत दुखद है। मैंने देखा है कि ऐसे किसी मुद्दे पर कोई पोस्ट आते ही लोग दो पक्ष में बंट जाते हैं और आपस मे एक दूसरे को गाली गलौज देने के स्तर तक उतर जाते हैं जबकि वास्तविकता ये होती है कि उनमें से 99 प्रतिशत लोगों को मूल मुद्दे का ज्ञान भी नही होता।
किसान आंदोलन के मामले में भी यही हुआ। जैसे ही इसमे वे लोग कूदे जो आज भी अभी अपने लिए राजनैतिक जमीन की तलाश कर रहे हैं वैसे ही सब खराब हो गया।
न्यूज़ चैनल से लेकर प्रिंट मीडिया तक और सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक ने इन बिलों के बारे में कोई तथ्य परक जानकारी जनता के समक्ष नही रखी जिसका फायदा उन लोगों ने उठाया जो अपने नैरेटिव जनता के दिमाग मे भरना चाहते थे। आज ऐसे कई तथाकथित पत्रकार हैं जो किन्ही के इशारे पर रात दिन वीडियो बना कर मीडिया में डाल कर देश को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
तो पहली बात ये है कि इन कानूनों को समझा जाय और उन बिंदुओं पर चर्चा की जाय जिन पर असहमति है।
ये तीन बिल है—
1.कृषि उत्पाद व्यापार एवम वाणिज्य(संवर्धन एवं सरलीकरण) बिल 2020–
इसका उद्देश्य किसानों को APMC (मंडी समितियों) से बाहर बेचने की छूट प्रदान करना है। इस कानून के तहत किसानों से उनकी उपज की बिक्री पर कोई सेस या फीस नही ली जाएगी।
2.मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान(सशक्तिकरण एवं संरक्षण) बिल 2020
— इस प्रस्तावित कानून के तहत किसानों को उनके होने वाले कृषि उत्पादों को पहले से तय दामों पर बेचने के लिए कृषि व्यवसायी फर्मों, प्रॉसेसर, थोक वोक्रेताओं निर्यातकों या बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ अनुबंध का अवसर मिलेगा।
3.आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल,2020–
ये प्रस्तावित कानून आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दालें, तिलहन,प्याज और आलू जैसी कृषि उपज को युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि व प्राकृतिक आपदा जैसी ‘असाधारण परिस्थितियों’ को छोड़कर सामान्य परिस्थितियों में हटाने का प्रस्ताव करता है तथा इस तरह की वस्तुओं पर लागू भंडारण की सीमा समाप्त हो जाएगी।
अब सरसरी निगाह से ये बिल बहुत अच्छे दिख रहे हैं और सरकार ने इसके पक्ष में अपने स्पष्टीकरण भी दिए हैं। फिर किसानों की आपत्तियां क्या हैं और वो किन मुद्दों पर इनका विरोध कर रहे हैं जिनके हल सरकार नही ढूंढ या सुझा नही पा रही है। अगर राजनीतिक दलों की शह पर कानून वापसी की बात को यहां न लिया जाय तो किसानों की चिंताओं की बाबत एक सम्यक दृष्टिकोण से चर्चा की जा सकती है। किसानों की चिंताएं—
1.न्यूनतम समर्थन मूल्य की समाप्ति का भय
2.मंडी समितियों की समाप्ति का भय
3.अनुबंध खेती में विवाद की स्थिति में किसानों को कोर्ट की राहत नही।
4.मंडियों को खत्म करके कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने की कोशिश।

  1. भंडारण की सीमा समाप्त होने पर कॉरपोरेट इसका अनुचित लाभ उठाएंगे।
    अब प्रश्न ये है कि सरकार इन चिंताओं को कैसे दूर करेगी जिससे कि किसान आश्वस्त हो सके। सरकार की तरफ से बयान आ चुके हैं और अपनी वार्ताओं में सरकार ने आश्वस्त किया है कि न तो MSP खत्म करेंगे और न ही मंडी समितियों को खत्म किया जाएगा। बात जायज है कि छोटे किसान दूसरी जगहों पर अपने उत्पाद नही बेच सकेंगे इसलिए उन्हें मंडियों की जरूरत पड़ेगी। दूसरी बात MSP यदि समाप्त हुई तो ये किसानों के हितों पर कुठाराघात होगा क्योंकि किसान पहले ही बहुत बुरी स्थिति में है और अगर वो बड़े व्यापारियों के रहमो करम पर हो गया तो उसकी स्थिति और खराब होगी। लिहाजा अगली वार्ता में सरकार यदि इसके लिए कोई ठोस उपाय कर दे तो किसानों को भी बात मान लेनी चाहिए। लेकिन कुछ और सुधारों की जरूरत है जैसे मंडी समितियों को खरीदी के लिए किसान के खेत तक जाना चाहिए तभी देश के बाकी किसान भी इसका लाभ उठा सकेंगे। दूसरे आढ़तियों पर भी अंकुश लगे कि वो MSP से कम दाम पर कृषि उत्पाद न खरीद सकें।
    कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पहले से देश में हो रही है और उसके संबंध में जो शंकाएं जाहिर की जा रही हैं वो राजनैतिक अधिक है वास्तविक कम। बिल में ऐसा कोई प्रावधान नही है कि किसान का खेत चला जायेगा। हाँ इसमे सुधार की गुंजाइश ये है कि कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने पर किसानों को सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि उन्हें बिला वजह अधिकारियों या कोर्ट के चक्कर न काटने पड़ें।
    आखिरी बात, आवश्यक वस्तु बिल, जहां तक मेरी समझ कहती है कि सरकार अपने गोदामों की दुर्दशा के कारण लायी है परंतु ये चिंताजनक है। जहाँ लाखों करोड़ों अन्य कार्यों पर खर्च हो रहे हैं वहां सरकार अत्याधुनिक गोदाम बनवाये और भंडारण स्वयँ करे। भंडारण की सीमा समाप्त करने पर ये तय है कि बड़े व्यापारी कृतिम अभाव पैदा कर अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करेंगे जिससे मंहगाई पर काबू करना मुश्किल होगा और प्याज के मूल्यों पर हमने सरकारों को गिरते देखा है। ये देश की जनता के लिए भी बहुत अच्छी स्थिति नही होगी और पहले से ही महंगाई से जूझ रहे मध्यम और निम्न वर्ग पर बड़ी चोट होगी हाँ इसमे कॉरपोरेट का एंगल खोजना गलत है विशेषकर अडानी और अम्बानी को इसमे खींचना केवल राजनीतिक शोशेबाजी है।
    उम्मीद है कि वो लोग जो राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण किसानों के लिए सोशल मीडिया पर अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उनको भी स्थिति स्पष्ट हुई होगी और वो जो अपनी प्रतिबद्धता के कारण बिल निरस्त करने के लिए तमाम फैलाये गए झूठों की लहर में बह रहे हैं वो भी स्थिति की वास्तविकता से अवगत होंगे।
    दुनिया में कुछ भी शतप्रतिशत सही नही होता और उसमें सदा सुधार की गुंजाइश रहती है परंतु जिस प्रकार से बिल को निरस्त करने की मांग उठ रही है वो देश की संप्रभुता को अस्वीकार करने जैसा है और विश्व मे इसका बहुत खराब संदेश जाएगा। 26 जनवरी को जो कुछ भी हुआ उससे देश का सर झुका है और ये जरूरी है कि दोषी व्यक्तियों को न केवल सजा मिले बल्कि वो मिसाल बने।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में दोनों पक्ष जल्दी ही एक सम्मानजनक समझौते पर पहुंच जाएंगे और देशवासियों की चिंताएं कम होंगी।

भाव जगत से

जैसे कोई किसी मकान में बहुत समय तक किराए पर राह जाए तो उसे ये भ्रम हो जाता है कि ये उसी का मकान है वैसे ही जीव शरीर मे रहते रहते उसे अपना समझ लेता है। हम भूल ही जाते हैं कि अस्तित्व ने हमे किराए पर घर दिया है रहने के लिए जिसे वो जब चाहेगा खाली करा लेगा। हमारी सदा ही उसे छोड़ने की तैयारी रखनी चाहिए। जीवन की नदी को पार करने के लिए शरीर वैसे ही माध्यम है जैसे कि नदी की नाव। नाव आप को उस पर ले जाने में मदद करती है, शरीर का भी पार उतरने में जो प्रयोग करता है वो ईश्वर की इस अद्भुत कृति का ऋण सही ढंग से चुकता करता है।

English Version: A tenant of a house who is living in it for a fairly long time thinks that it is his house. In the same way the person who lives in human body thinks he is the body. He forgets that Existence has rented us this body and we should always be ready to vacate it. As we use the boat to cross the river so we should use this body to cross the river of life as it is a medium to cross the river of life.Those who use it as a medium are repaying the loan provided by Existence in the form of wonderful creation.

Om : The Sound of Cosmos

        A lot has been written about Om, its origin, its importance, its religious importance, its spiritual value. But there is a big question that is it a ‘word’ or can we call it a word?

        Few western thinkers have described Om as a Symbol in Hindu religion. But its frequent occurrence in Buddhist and Jain literature proves them wrong. We have similar words in other religion or language for example Ameen in Urdu or Omni in English but they cannot be said as synonym for Om.

        Om is a sound which is consist of A,U,M. According to Hindu mythology, before the Cosmos came in to existence there were sound waves only. It is also called Pranav because the sound of Om comes from ‘Prana’ (vital vibration), which feels the Universe. There are traces that those sounds are still present. These basic sounds are A,U and M.

        In Indian mythology there are so many trios and Hindus equate them with A,U and M. For example there are Brahma (The creator), Vishnu (The Administrator) and Mahesh (The destroyer). Bhur (the physical world), Bhuvah (the mental world) and Svah (the celestial, the spiritual world). Three worlds of earth, atmosphere and heaven; thought speech and action; the three qualities (gunas) of the matter (googness, passion and darkness); and the three sacred Vedic scriptures (Rigveda, Yajurveda and Samveda). Thus, Om mystically embodies the essence of entire universe. The Aitreya Brahman of Rigveda in Section 5.32, for example suggest the three phonetic components of Om (a+u+m) correspond to the three stages of cosmic creation.

        The syllable is discussed in a number of the Upnishads (speculative philosophical texts) and it forms the entire subject matter of one, the Mandukya  Upnishad.      

        As we know that before the discovery of Neutrons, Protons and Electron the Atom was considered the unit of matter. But the discovery of Neutron, Electron and Proton has turned the table upside down. Now the matter is also a manifestation of energy.

        This energy is in the form of sound waves. If we sit silently in a          place where worldly sounds are least we come across with a feeble humming sound which is somewhat like Om. It is not exactly the Om but it is almost like it.

        Encyclopaedia Britannica says, “The syllable Om is composed of the three sounds, a-u-m (in Sanskrit, the Vowel a and u coalesce to become O)”. Thus a-u becomes O and with m it became Om.

        Indian mystics have tried to search the answer for the question that why Om is so important. According to Vedas, there are seven kingdoms or spheres or planes of existence or human body each more spiritually advanced than the previous one. Many tantric Buddhist teachings have also referred to these seven kingdoms. The first being physical which we all know. The second is Etheric body and the third – which is beyond this second, is Astral body. The fourth – which is beyond this, is the Mental of Psychic body; and the fifth – which is beyond this again – is the Spiritual body. The sixth is beyond the fifth, and it is called the cosmic body. Then the Seventh and the last is the Nirvan Sharir, the bodiless body. The soul effort of humankind is to know all the bodies. If a man or women realizes the sixth one then only there is possibility of God-Realization. He becomes one with that which is. The declaration of ‘Aham Brahmasmi’- I am the God – is of this plane. But there is one more step where “Aham” and “Brahm” also vanishes, where ‘I’ and ‘thou’ are totally non-existent, where there is total and absolute void. This state was unexplainable. No word was able to explain the ‘Nirvana Sharir’ or bodiless body. To indicate this seventh state we needed something absurd which has no meaning yet meaningful. Then the Om was discovered. Om has no meaning but still it denotes ‘the ultimate’.

        It is the primordial fundamental sound symbolic of the Universal Absolute.

रेस

ट्रेन के छूटने का समय हो गया था. गौरी और आशुतोष ने मेरे पांव छुए और बाय बाय माँ कहते हुए डिब्बे के बाहर जाकर खिड़की के पास आ खड़े हुए थे. तब तक ट्रेन ने सरकना शुरू कर दिया. वे दोनों कुछ कदम तो साथ चलते रहे पर जब रफ्तार बढ़ गयी तो एक जगह रुक कर वहीँ से हाथ हिलाते रहे. कुछ देर तक उनका हाथ दिखता रहा फिर वे आँखों से ओझल हो गए और ट्रेन सरकते हुए प्लेटफोर्म के बाहर निकल गयी. ट्रेन के समान्तर सड़क पर भागती गाड़ियों का रेला दिखाई पड़ने लगा.

मैं ए सी टू टायर के अपने बर्थ पर अधलेटी सी हो गयी, अचानक आंसुओं का सैलाब आया और गालों से बहते हुए मेरी साडी को भिगाने लगा. ये आंसू ऐसे ही थे जैसे कोई रेस में फिनिश लाइन पार करे और ख़ुशी से उसके आंसू फूट पड़ें. मेरे लिए भी जीवन एक रेस बन कर रह गया था और आज अचानक लगा जैसे मैंने फिनिश लाइन पार कर ली हो. मैंने आंसुओं को बहने दिया, बहते हुए आंसू मेरे मन पर जमी धूल को धोते रहे. काफी देर तक मैं उसी हालत में पड़ी रही. थोड़ी देर बाद जब आंसुओं का ये तूफान रुक गया तो मैंने खुद को व्यवस्थित करना शुरू किया.

बाहर ट्रेन शहरी सीमा पर कर खेतों खलिहानों से गुजर रही थी. बादल, पेंड़, पौधे, खेत, नदियाँ, नाले सब तेजी से पीछे भागते जा रहे थे. और उन्ही के साथ मेरा मन भी पीछे की ओर भागता चला गया. मेरे जीवन की ये रेस कोई अठारह साल पहले शुरू हुई थी. उसके पहले सब ठहरा हुआ था. मेरे पति अविनाश, मैं और मेरे दो बच्चे गौरी और उपेन्द्र. बस यही मेरी छोटी सी दुनिया थी. मैं अपनी इस दुनिया में पूरी तरह तृप्त, संतुष्ट और मगन थी. अविनाश ने गरीबी देखी थी. पिता साधारण किसान थे. किसी तरह अविनाश को पढाया था. पर अविनाश ने पिता की मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने दिया. हालाँकि पिता चाहते थे कि अविनाश सरकारी नौकरी करे पर अविनाश खुद का रोजगार करना चाहते थे. उन्हें अपनी काबिलियत और परिश्रम पर भरोसा था. सो उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान खोलने का निर्णय लिया. हालाँकि बाज़ार में कड़ी प्रतिस्पर्धा थी और बड़े पूंजीपतियों के बड़े बड़े शो रूम थे पर अपने मधुर व्यवहार, कड़ी मेहनत और लगन की बदौलत अविनाश ने अपने ग्राहकों का विश्वास जीत लिया था लिहाजा उनके संतुष्ट ग्राहक ही उनके प्रचार का माध्यम बने और एक छोटी सी दुकान से सुन्दर शो रूम तक का सफ़र कब तय हो गया पता ही नहीं चला.

अपनी व्यस्तताओं के बावजूद अविनाश बच्चों को और मुझे पूरा वक्त देते थे. हर रविवार हमारे लिए पिकनिक जैसा होता था. आउटिंग, शापिंग, मूवी और बाहर खाना. जिंदगी जैसे सुख के झूले पर पेंगे मार रही थी. अविनाश के शोरूम और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद मैं अपना पढने का शौक पूरा करती. किताबों का संसार मेरा दूसरा संसार था. अज्ञेय, मोहन राकेश, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, फ्योदोर दोस्तोएवस्की, मैक्सिम गोर्की और तमाम लेखकों कि किताबें मेरे संग्रह में थीं जो दिन प्रतिदिन बढ़ ही रहीं थीं. मेरा जीवन एक सुनहरे सपने कि तरह बीत रहा था जैसे एक मस्त नदी अपनी मौज में बहती चली जा रही हो. अचानक एक दिन ये नदी एक चट्टान से टकराई और वो सुनहला स्वप्न टूट गया. एक भयावह यथार्थ मेरे सामने एक मगरमच्छ की तरह आ खड़ा हुआ था. पता नहीं कब से अविनाश के सर में ट्यूमर पल रहा था जिसके लक्षण भी कभी नहीं दिखे. बस एक दिन उन्होंने सर दर्द की  शिकायत की और खुद ही कहा कि सीजनल होगा पर जब दो तीन दिन तक दर्द में कमी नहीं आई तो डॉक्टर को दिखाया गया. कुछ टेस्ट हुए और जो रिपोर्ट आयी उसने हमारे पैरों के नीचे की जमीन खींच ली. ऑपरेशन ही एक मात्र रास्ता बताया गया पर जब तक ऑपरेशन हो पाता अविनाश का जीवन पक्षी अपना पिजरा खाली कर गया और उसके नाम को ही गलत साबित कर गया. मैं दहाड़ें मार कर रोना चाहती थी पर भीतर कुछ अटक गया था और मैं एक गहरे शून्य में विलीन हो गयी थी. नातेदार रिश्तेदार सब एक ही प्रयास में थे कि मैं किसी भी तरह से बोलूं या रोऊँ पर मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था. आखिर अविनाश को सजा वजा के लोग लेके चले गए पर मैं वैसे ही बेसुध सी पड़ी रही. घाट के सभी कार्यक्रम उपेन्द्र से ही करवाए गए. जब वो लोग घाट से लौटे तो घुटे सर और सफ़ेद कपडे लपेटे उपेन्द्र को देखकर मेरे भीतर का रुका हुआ बांध टूट गया और मैं तब तक रोती रही जब तक कि बेसुध नहीं हो गयी.

लेकिन रस्में तो पूरी करनी ही थीं. मेरी छोटी बहन और उसके पति आ गए थे. मेरे देवर और उनकी पत्नी तो अस्पताल से ही साथ थे तो उन लोगों ने सब संभाल लिया था. उपेन्द्र को उस रूप में देखकर मेरा कलेजा मुह को आ जाता था और रोकते रोकते भी आंसू आ जाते और हिचकियाँ बंध जातीं. जैसे तैसे तेरही का कार्यक्रम पूरा हुआ. नातेदार और रिश्तेदार वापस जाने लगे. बहन की गृहस्थी की जिम्मेदारियां उसे वापस जाने के लिए मजबूर कर रहीं थीं. देवर भी इतने दिन से छुट्टी पर थे तो उनका वापस जाना भी जरुरी था. मुझे तरह तरह कि सलाहें और निर्देश देकर सब चले गए.

मेरे जीवन की नदी अचानक एक बड़े से मरुस्थान में आकर विलीन हो गयी थी और सामने अंतहीन रेगिस्तान का फैलाव था जहाँ न कोई छाया थी न कोई मंजिल. उपेन्द्र का इस साल इंटर फाइनल था और गौरी आठवीं में थी. बच्चों को स्कूल भेज कर जब मैं अकेली हुई तो एक बड़ा सा प्रश्न मेरे सामने फन फैला कर खड़ा हो गया, अब ? अविनाश की माला चढ़ी तस्वीर के सामने खड़ी मैं यही प्रश्न करती रही कि अब? तभी मेरे भीतर से आवाज आई, मुझे लगा कि अविनाश कुछ कह रहे हैं कि ,’नहीं सुभि तुम्हे हिम्मत नहीं हारनी है. अब से तुम उपेन्द्र और गौरी की मां और पिता दोनों हो. ईश्वर ने मुझे बुला लिया तो क्या तुम तो हो उन्हें कोई कमी नहीं होने देना और उन्हें पढाई पूरी करने देना. मुझे अपना मन मजबूत होता सा लगा. शायद जब विपत्ति आती है तो ईश्वर ताकत भी प्रदान करते हैं उससे निपटने की.

मैंने निश्चय किया कि मैं घर और दुकान दोनों सम्भालूंगी. मैंने फ़ोन उठाया और दुकान के स्टाफ को फोन मिलाकर शाम को घर पर बुलाया. शाम को मैंने उन लोगों से कहा कि कल से दुकान खोलिए और मैं दुकान पर बैठूंगी. उपेन्द्र ने कहा कि मम्मी मैं दुकान पर बैठ जाता हूँ तो मैंने साफ मना कर दिया कि नहीं पहले पढाई पूरी करो.

पर ये सारा कुछ इतना आसान नहीं था. हमारा समाज अभी भी उतना प्रगतिवादी नहीं हुआ है कि एक महिला दुकानदार को सहज स्वीकार कर ले. एक तरफ पुरुष दुकानदारों के अहम् को चोट लगती थी कि कैसे ये हमारे मुकाबले में खड़ी हो सकती है. ग्राहक भी कई बार मुझे घूरने में अधिक रूचि दिखाते से लगते. भारतीय समाज में स्त्री जब काम के लिए बाहर निकलती है तो वो पहले स्त्री देह होती है एक जीता जागता मनुष्य नहीं. सबसे अधिक तब खला जब यदा कदा सहायता के बहाने अविनाश के कुछ मित्रों ने भी निगाह मैली करने कि कोशिश की. कभी भाभी जी भाभीजी करने वालों का ये बदला रूप देख कर मैं सन्न रह गयी थी. पर अब तो लड़ना ही था. मैंने अपनी सारी उर्जा को दुकान में झोंक दिया परिणाम ये हुआ कि दुकान फिर से पहले की तरह चल पड़ी. जीवन की यही विशेषता है कि वो रुकता नहीं सदैव गतिमान रहता है. उपेद्र का ग्रेजुएशन पूरा हो गया तो उसने एम् बी ए करने की इच्छा प्रगट की. मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी, अँधा क्या चाहे दो आंखे. गौरी भी पढने में पूरी मेहनत कर रही थी. एक संतुष्टि थी कि मैं अविनाश के सपनो को पूरा कर पा रही हूँ और जब मेरी उनसे उस लोक में मुलाकात होगी तो वो कहेंगे, वाह! सुभि तुमने कर दिखाया.

उपेन्द्र का एम् बी ए पूरा होते होते शहर कि एक कंपनी में नौकरी लग गयी. ये सोने में सुहागा जैसा था परमात्मा एक बार फिर मेहरबान था मेरे ऊपर. उपेन्द्र की पसंद की एक लडकी से शादी करके मैं घर में बहू ले आयी. उपेन्द्र कि शादी के समय मैं सबके सामने तो शांत बनी रहती पर जब अकेली होती तो अविनाश को याद करके आंसू बहाती कि वो होते तो कितने खुश होते.

शादी के बाद कुछ दिन बहुत अच्छे बीते. घर में रौनक सी आ गयी थी. गौरी को तो एक सहेली मिल गयी. उपेन्द्र अक्सर दोस्तों को बुला लेता और घर में पार्टियों का दौर चलता. पर पार्टियों के कारण खाने पीने में देरी होती तो मेरी नींद पूरी नहीं हो पाती जिसके कारण दिन में सुस्ती सी रहती. एक दो बार मैंने कहा भी कि तुम लोग पार्टी कर लिया करो, मुझे समय से सोने दिया करो जिस पर बहू ने आपत्ति की. उसने कहा कि अगर आपको नहीं पसंद है तो आगे से हम होटल में पार्टी कर लिया करेंगे. ये शायद आने वाले तूफान का संकेत था. मुझे लगने लगा कि जिन छोटी छोटी बातों को उपेन्द्र एकदम सहजता से लेता था अब उन पर झुंझलाने लगा था और उसकी आवाज में तल्खी आने लगी थी. जब गौरी को पढाई के लिए मुंबई जाने की बात आई तो उपेन्द्र इसके सख्त खिलाफ हो गया. उसका सीधा कहना था कि लड़कियों को बहुत पढ़ना नहीं चाहिए नहीं तो शादी में दिक्कत आती है. मैंने दबी जबान से कहा भी कि शादी के लिए किसी की पढाई को दोष कैसे दिया जा सकता है पर उपेन्द्र इसके लिए राजी नहीं था और बहुत ही उल जलूल तर्क देने लगा था. पर हर बार अविनाश कहीं मेरे कानों में कह जाते कि सुभि गौरी की पढाई रुकनी नहीं चाहिए. गौरी ने साइबर क्राइम डिप्लोमा में एडमिशन ले लिया और मुंबई चली गयी. इस बात से उपेन्द्र बहुत नाराज हुआ. और उसने बात बात में टोका टोकी शुरू कर दी.

मुझे अब गौरी की शादी की चिंता सताने लगी. एक दिन मैंने उपेन्द्र से कहा कि बेटा अब हमें गौरी के लिए लड़का देखना शुरू कर देना चाहिए तो उसने मुझे टका सा जबाब पकड़ा दिया कि जब सब तुम्हे अपनी मर्जी का ही करना है तो शादी भी कर डालो, मुझसे कोई उम्मीद मत रखना. इतना कह कर वो पैर पटकता हुआ चला गया. छन्न…न….न…! मेरे भीतर कुछ टूट कर बिखर गया जिसकी किरचें मेरी आत्मा में चुभती चली गयीं. मेरी आंखे गंगा जमुना हो गयीं. जिस बेटे को पालने पोसने में मैंने कोई कोर कसर नहीं रक्खी उसका ये व्यवहार? फिर एक बार मैं अविनाश की फोटो के सामने सारी रात बैठी रोती  रही रोती रही….वो ही मेरी ताकत थे और मेरे गुरु भी. रोते रोते कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला रात अपनी चादर समेट कर जा रही थी और दिन की उजास खिड़की के रास्ते मेरे कमरे में भी उजाला करने लगी. सूरज की एक कोमल किरण ने मेरी पलकों को छुआ जो रोते रोते सूज गयीं थीं मानो अविनाश कह रहे हों कि उठो शुभि हर रात एक नया दिन लेकर आती है.

मैंने अपने सभी जानने पहचानने वालों, नातेदारों, रिश्तेदारों दोस्तों से गौरी कि शादी की बाबत चर्चा शुरू कर दी. रिश्तों का पता चलना शुरू हो गया. कई रिश्ते पसंद आ रहे थे पर समस्या थी कि लड़की की तरफ से बात कौन करे. उपेन्द्र ने तो अपनी तरफ से चुप्पी की चादर तान ली थी. फिर मैंने खुद ही बात करने का निर्णय लिया. उपेन्द्र के इस अप्रत्याशित व्यवहार से रिश्तेदार भी मेरा संग देने में हिचकने लगे थे. तभी एक बहुत अच्छा रिश्ता पता चला तो मैं उसे अंजाम तक पहुचाने के लिए जी जान से जुट गयी. मैंने अपनी बचपन की सहेली को अपनी समस्या बताई तो उसने कहा कि तू बता कहाँ चलना है मैं और मेरे पति चलेंगे. हमने लड़के के घर जाकर सब देखा सुना और फिर गौरी की फोटो और बायो डाटा उनको दिया. फिर तय हुआ कि लड़की और लड़का एक बार मिल के अपनी सहमति दे दें तो आगे की तैयारी की जाये. गौरी और आशुतोष ने एक दुसरे को पसंद कर लिया. फिर क्या था उपेन्द्र की उदासीनता के बावजूद मैंने यह कार्य भी संपन्न कर ही लिया. दोनों को मुंबई में ही नौकरी मिल गयी थी और उन्होंने अब अपना एक फ्लैट किराये पर ले लिया था. मैं उसी फ्लैट में उन दोनों की गृहस्थी सजा कर वापस लौट रही थी.

बाहर शाम घिरने लगी थी जिससे खिड़की से कुछ दिखाई पड़ना बंद होने लगा था हाँ कहीं बिजली जली होती तो जुगनू की तरह चमक कर विलीन हो जा रही थी. मैंने एक गहरी सांस लेकर अपनी आँखे मूंद लीं. ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार में भागी जा रही थी मानो कोई रेस हो रही हो…………..

फिक्स जमा

सितम्बर का महीना चल रहा था, पितृपक्ष बीत गया था. पितृपक्ष में गज़ब की उमस थी पर विषव आते आते मौसम में बदलाव आ गया था. घने बादल छाये हुए थे और लगता था कि अब बरसा कि तब बरसा. ठंडी हवा बता रही थी कि कहीं तो बारिश हुई है. इस मौसम में मुझे घर के अन्दर नहीं रखा जा सकता. घने बादल और ठंडी हवाएं मेरे भीतर के आकाश में उतरती चली जाती हैं और मैं प्रकृति से एकाकार हो जाता हूँ.

चाय ख़तम हो जाने के बाद भी मैं अख़बार लेकर बैठा था. वैसे तो आजकल अख़बार में पढने लायक कुछ खास होता नहीं है. बारह पेज का अख़बार हुआ तो छह पेज ऐड होते हैं, कुछ बासी ख़बरें जिन्हें हम रात कम से कम दस बार टी वी पर देख चुके होते हैं. पर कहते हैं न कि जो छूट जाये उसे आदत नहीं कहते. तो एक ही खबर की जुगाली करने की आदत सी हो गयी है. वैसे भी बॉलीवुड में जब से ड्रग वाला प्रकरण चला था अख़बार वालों को भी खूब मसाला मिल ही रहा था.

तभी गेट खुलने कि आवाज आई. कुर्सी पर बैठे बैठे नीचे झाँका. एक आदमी मास्क लगाये अन्दर आकर गेट चिपका रहा था. मेरी प्रश्नवाचक निगाह देख कर वो समझ गया कि मैंने उसे पहचाना नहीं था. उसने नमस्ते करते हुए कहा, ‘मैं, रामबली भईया जी.’ रामबली मेरा पुराना ड्राईवर था. तभी पत्नी की आवाज आयी, कौन आया है? मैंने बताया कि रामबली आया है. पत्नी का तुरंत आदेश आया, ‘आप मास्क लगा लीजिये’. इस कोरोना ने हमारे जीवन को कितना उलट पुलट के रख दिया है. घर में किसी के आते ही हम उसका स्वागत करने कि बजाय अपना मुंह छुपाने में लग जाते है. मुझे उठ कर भीतर जाना अच्छा नहीं लगा सो मैंने रामबली को ही दूर पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया.

वो कुछ हिचकते हुए बैठ गया. वो थोडा परेशान  भी लग रहा था. रामबली कभी मेरी गाड़ी चलाता था. बेहद सीधा सादा, गाँव से आया था. पिता कि मृत्यु के बाद दो छोटे भाइयों की जिम्मेदारी भी उस पर आ गयी थी. खेती से राशन भर की  व्यवस्था तो हो जाती थी पर जीवन की अन्य जरूरतों के लिए पैसे की आवश्यकता उसे शहर खींच लायी थी. पिता के जीवित रहते ही अपने मित्रों की सलाह पर उसने गाड़ी चलाना सीख लिया था और लाइसेंस भी बनवा लिया था. अपने उसी हुनर को लेकर अपनी किस्मत आजमाने वो शहर आ गया था. गनीमत थी कि वो डिग्री बटोरने के चक्कर में नहीं पड़ा था वर्ना आज वो भी बेरोजगारों कि पंगत में खड़ा सरकार को कोस रहा होता.

उसका एक दोस्त जो हमारे विभाग में सरकारी गाड़ी चलाता था, उसे एक दिन मेरे पास ले आया था. ‘सर, ये रामबली है मेरे गाँव का, गाड़ी चलाना जानता है. इसके पास लाइसेंस भी है. अगर कोई जुगाड़ हो जाता तो….’ उसका दोस्त सिफारिश करते हुए बोला.

इधर काफी दिनों से मुझे लग रहा था कि गाड़ी चलाना थका देने वाला होता जा रहा था. जनसँख्या का दबाव इतना बढ़ गया था कि प्रशासन की तमाम कोशिशों के बाद भी ट्राफिक व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही थी. कभी कभी तो घर से ऑफिस पहुँचते पहुँचते थकान तारी हो जाती और सर भारी हो जाता, शायद बढती उम्र का भी असर था. मैं सोच ही रहा था कि अब एक ड्राईवर रख ही लूँ कि ड्राईवर खुद चल कर मेरे पास आ गया था. ये एक सुखद संतोष ही था कि मुझे मुंह मागी मुराद मिल रही थी. मैंने उससे कहा कि विभाग में तो कोई व्यवस्था नही है, हाँ अगर मेरी गाड़ी चलाना चाहो तो बोलो कितना पैसा लोगे? वो सर झुकाए चुप चाप खड़ा रहा. उसका दोस्त ही बोला, जो उचित हो दे दीजियेगा सर. मैंने कहा कि सात हजार दूंगा उससे एक पैसा अधिक नहीं. सोचा, पहले ही सब बात कर लेना ठीक रहेगा, बाद में किचकिच करना ठीक नहीं लगता मुझे. सुबह समय से आकर गाड़ी नियमित साफ़ करनी होगी, कभी कभी दौरे पर जाना होगा और घर के लोगों को गाड़ी का काम होगा तो वो भी देखना होगा. ‘ठीक है साहब’, इतनी देर में पहली बार उसकी आवाज निकली थी. और हाँ, ये साहब वाहब कहने कि जरुरत नहीं है तुम मुझे भईया कह सकते हो, मैंने जोर देते हुए कहा. पर उसने थोडा संशोधन करके ‘भईया जी’ कर दिया था.

दूसरे दिन से रामबली काम पर आ गया था. दो चार दिनों में ही गाड़ी पर उसका कमांड हो गया था. गाड़ी तो वो अच्छी चलाता ही था पर अपने मधुर व्यव्हार से उसने घर में सबका दिल जीत लिया था. अब उसका चाय नाश्ता भी मेरे यहाँ ही होने लगा था और पत्नी के बहुत से कामों में भी वो मदद करता था. धीरे धीरे उसका वेतन भी बढ़ता रहा और दस हजार तक पहुँच गया था.

बीच बीच में तीज त्यौहार पर रामबली गाँव भी हो आता. भाइयों ने खेती बारी संभाल ली थी और रामबली ने उन लोगों को छोटा मोटा रोजगार भी करवा दिया था जिससे अब जीवन में स्थिरता आ गयी थी. फिर बारी बारी से रामबली और उसके भाइयों की शादी भी हो गयी. घर में संख्या बढ़ने पर खर्च बढ़ना स्वाभाविक था जिसका बड़ा हिस्सा रामबली अभी भी पूरा कर रहा था. पर जैसा कि सामान्यतः देखा जाता है कि परिवार बढ़ने पर छोटी मोटी खटपट शुरू हो जाती है तो रामबली के साथ भी ये सब शुरू हो गया. इसी बीच वो अपनी पत्नी को शहर ले आया जो कि छोटे भाइयों को बहुत नागवार गुजरा. उनकी मांगे बढ़ने लगीं.

इधर मेरा प्रमोशन हो गया तो मुझे विभाग से गाड़ी और ड्राईवर भी मिल गया. मैंने चाहा तो कि ड्राईवर मैं अपना रख लूँ पर इसकी अनुमति नहीं मिली. तभी एक दिन रामबली ने कहा कि भईया जी आप को ड्राईवर मिल ही गया है तो मुझे कुछ लोन दिलवा देते तो मैं अपनी गाड़ी लेकर चला लूँगा. मेरे भी खर्च बढ़ रहे हैं. बच्चे भी अब पढने जाने लायक हो रहे हैं. जैसे एक दिन जरुरत होने पर रामबली खुद आ कर खड़ा हो गया था वैसे ही आज फिर वो खुद मुझे असमंजस से उबारने के लिए आ खड़ा था क्यूंकि उसे काम से मना करने की हिम्मत मैं नहीं कर पा रहा था.  ईश्वर कि ये अद्भुत लीला ही थी, वास्तव में ईश्वर सदा ही हमारे साथ रहता है पर अक्सर हम ही चूक जाते हैं उससे. फिर मैंने अपनी सिक्यूरिटी देकर उसे एक कार लोन पर दिलवा दी. अब वो अपनी गाड़ी चलने लगा था पर फिर भी महीने दो महीने में एक चक्कर मेरे यहाँ का लगा जाता था. कभी कुछ पैसों की भी जरुरत आ पड़ती तो श्रीमती जी से ले जाता था और तब तक वापस नहीं आता जब तक पैसे लौटने का बंदोबस्त न कर लेता.

एक दिन ऑफिस से लौटा तो पत्नी ने बताया कि, ‘रामबली आया था, पिए हुए था और पैसा मांग रहा था, मैंने उसे बहुत डाटा और कहा कि फिर कभी पी के यहाँ मत आना.’ उसके दोस्त से ही पता चला था कि भाइयों के रोज के झगडे से तंग आ कर उसने पीना शुरू कर दिया था. उसे टी.बी. भी हो गयी थी. मैं उसे बुलाना चाहता था पर पत्नी के क्रोध को देखते हुए मैंने चुप रहना ही ठीक समझा. तब के बाद रामबली कभी दिखाई नहीं पड़ा और आज अचानक इस कोरोना काल में सामने आ खड़ा हुआ था. उसके चेहरे पर परेशानी देख कर मुझे लगा कि वो आज भी पैसे मांगने आया होगा. मैं मन ही मन में सोचने लगा कि कितने पैसे मांगेगा वो, और क्या पत्नी राजी होंगी देने के लिए. उस दिन की घटना के बाद उनका चित्त उसकी तरफ से खिन्न हो गया था.

मैंने उसका हाल चल पूछा. वो बताने लगा कि कैसे उसके भाइयों ने गाँव के घर में उसे हिस्सा देने से मना कर दिया है. खेती बारी के लिए घर जाने पर उसके सामने रहने की समस्या आ गयी है. अब तो मैं निश्चित ही हो गया कि वो कुछ न कुछ मदद जरुर मांगने वाला है. तभी उसने पूछा भईया जी कुछ पैसा बैंक में जमा किया है. कोई कह रहा था कि ब्याज पर टैक्स कट जायेगा. मैंने पूछा कि कितना पैसा जमा है? इस पर उसने अपने झोले से एक फिक्स जमा की रसीद मुझे पकड़ा दी. दस लाख का फिक्स था. मैंने कहा कि तुम फॉर्म ६१ भर के जमा कर दो तो तुम्हारा टैक्स नहीं कटेगा.

अब मैं उससे बात कर तो रहा था पर भीतर ही भीतर मैं खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. इस बार उसने मुझे असमंजस से उबारा नहीं बल्कि डाल दिया था. मेरे भीतर अपने प्रति शर्मिंदगी का भाव भर गया था. हर गरीब व्यक्ति जब हमारे समक्ष खड़ा होता है तो हमे लगता है कि बस वो कुछ मांगने ही आया है. ‘ठीक है भईया जी अभी जा के फॉर्म भर के दे देता हूँ.’ इतना कह कर वो उठा और मेरे पैर छू लिए. पर मेरे हाथ आशीर्वाद के लिए नहीं उठ सके. मुझे लगा कि आशीर्वाद देने का हक़ मैंने खो दिया है.

मैं शून्य आँखों से उसे सीढियाँ उतरते हुए देख रहा था………

Role of Yoga in Pandemic

You may ask what is the relationship of Yoga with the present pandemic..

The Corona pandemic has changed the world and has affected every aspect of life. The changes are so distinct that when the history will be written may be it will be divided into Before Corona (BC) and After Corona (AC) era. There has been a tremendous change in the behavior of people. Sudden lock down and social distancing has resulted in mental trauma, anxiety, sleep disorder among the people throughout the globe. Since the onset of Covid 19 we have come across with a new set of vocabulary like Lockdown, Social Distancing, Quarantine, Isolation, Sanitizer, PPE etc.

Almost every country where Corona knocked faced a total lock down. Every means of transport came to a standstill. People were forced to confine to their houses. Roads were deserted. All vehicles were off the roads. Offices, Airports, Railways, Industries, Hotels were closed and marriages, Festivals and Parties were either cancelled or postponed . All these things left a great impact on the mental health of the people throughout the world. The mental health emerged as a crisis before the world. It is being reported that mental stress, anxiety, insomnia and several other mental disorder have increased during this period.

Psychiatrists and scientists are trying hard to find out the way to get rid from this crisis. But the chemicals given from outside is either not working and in some cases where it has given a relief to some extent is not without side effects. We all know that our body releases so many chemicals for various purposes. It will not be exaggeration to say that our body is the biggest chemical factory on earth and we can use inner chemical to cure the present mental crisis. Here the Yoga comes in the picture.

Now the Yoga and meditation is being considered as strong means to overcome the mental disorder. Even the Scientist are also discussing with spiritual gurus. But before we get into detail it would be better to clear the perception about Yoga. The Yoga we see now-a-days wherein bending the body and doing various poses is in fashion. Big Yoga institutes have opened and Yoga trainers are running their shops attracting celebrities. But Yoga is not all that Circus.

Yoga means union. As per scriptures of Bharat, it was Adi yogi, the Lord Shiv, who first propounded the Yoga and taught it to his seven disciples who came to known as Sapta Rishis. Later on it was Patnjali who wrote the first ever book on Yoga.

Yoga means ‘to unite’. So Yoga is the union of body, mind and spirit or we may simply call it union of oneself with the ultimate. Here lies the difference between science and yoga. In science there is body and mind(brain) where as yoga believes in a third entity, the Manas, the scientist call it psyche. Yoga says that until the above three are in proper alignment we can’t be healthy either physically or mentally.

Now the question arises that how come Yoga can be helpful to combat the present crisis raised out of pandemic. In such a situation , it is even more vital to enhance our exuberance and inner balance so we could be strong. First of all we have to look into the crisis. Why people are succumbing to mental distress, agony, anxiety, insomnia etc. In present day scenario we can see that combined families have almost vanished. The religion has become a tool in the hands of politician. Family and religion were big support for the individual, they provided support and strength to fight in any adverse situations.

In present materialistic world almost every aspect of our life is being controlled by the market. We are ready to purchase everything but we forget that mental peace, happiness and positivity can not be purchased. For all these we have to understand that dimensions of life where science has not been able to penetrate hitherto. Here we have to see that how yoga is going to help us. Suppose that a person is disillusioned, has become hopeless and is feeling that his life has no meaning at all. He is absolutely despaired. His anguish his sufferings are just on the verge of madness and suicide then Yoga comes to his rescue. Patanjali, the writer of Yog Sutra, says, ‘Yogas-chitta-vritti-nirodha.’ Negation of mind is Yoga. The Man(psyche) is collection of memories all which came from outside. Yoga says turn in ward and remain in present moment. Yoga says that human has enormous possibility, he has the energy which can take him to pleasure, peace and prosperity or you can go in misery, stress and all that running which has resulted out of illusion. Choice is yours. You are the master of your destiny is what Yoga says.

Lock Down and Senior Citizen..Part5

मेरी पिछली पोस्ट पर बहुत से मित्रों का कहना था कि मुझे हिंदी में लिखना चाहिए। मित्रों की भावनाओं का सम्मान करते हुए मैंने निर्णय लिया कि इस श्रृंखला की समापन किस्त को मातृ भाषा मे लिखा जाय। आप सबके आदेश को सिर माथे लगाते हुए इस बार हिंदी में आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ।

समाचार पत्रों और थोड़ी बहुत टी वी की खबरों से ये पता चल रहा था कि अधिकतर निजी अस्पतालों ने अपनी सेवाएं बन्द कर दी हैं और सरकारी अस्पताल केवल covid19 के मरीज ही देख रहे हैं। ऐसे में एक भय हमेशा बना रहता था कि अगर कोई आकस्मिक जरूरत आ गयी तो क्या होगा? और ये भय केवल हम बुजुर्गों का ही नही था बल्कि देश की आम जनता का था। इसका जहाँ नकारात्मक परिणाम हो रहा था वहीं इसके सकारात्मक पहलू भी थे। छोटी छोटी तकलीफ में भी जो लोगों को डॉक्टर के पास भागने की आदत थी वो कम हुई। ये बड़े आश्चर्य की बात थी कि जो अस्पताल मरीजों से भरे रहते थे वो खाली हो गए थे। आखिर वो सारे मरीज गए कहाँ। श्मशान घाट वालों का भी कहना था कि शवों की आवक पहले की अपेक्षा 35 प्रतिशत रह गयी है। सबसे बड़ी बात ये थी कि कोरोना का ये भय पूरे विश्व मे लोगों पर तारी था। यूरोप और अमेरिका जैसे देशों ने लोगों के मानस पटल पर इसके प्रभावों का अध्ययन शुरू किया तो आश्चर्य जनक तथ्यों से सामना हुआ। अकेले अमेरिका में 60 प्रतिशत लोग एंग्जायटी डिसऑर्डर के शिकार थे साथ ही डिप्रेशन जैसी अन्य मानसिक बीमारियां भी चारो तरफ दिखाई पड़ रही थीं। हमारे देश मे भी लाखों लाख युवा नौकरियों से निकाल दिए गए थे जिसके असर उनके मानस पर पड़ना स्वाभाविक था। ये वो वक्त था जब दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया कि इस समस्या से निपटने में योग और ध्यान ही सबसे कारगर उपाय है। चूंकि हम लोग नियमित रूप से योग और प्राणायाम कर रहे थे और मैं तो प्रतिदिन आनापान सती ध्यान योग का भी अभ्यास कर रहा था तो उस सीमा तक हम लोग एंग्जायटी की जद में नही आये थे और प्राणायाम ने हमें इतने खराब मौसम में भी सर्दी जुकाम बुखार से दूर रखा जिसके लिए हम दोनों सदा ही सुबह उठते ही परमात्मा का धन्यवाद करना नही भूलते थे। किंतु सब इतने भाग्यशाली नही थे, विशेषकर हमारे मजदूर भाई जो रोजगार की तलाश में अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर थे। जिन फैक्ट्रियों में वो काम कर रहे थे वो बन्द थीं और मालिकों ने वेतन देने से इनकार कर दिया था। मकान मालिक किराया देने या घर खाली करने का दबाव बना रहे थे। राज्य सरकारों ने इस सबसे आंख मूद ली थी ऊपर से कोरोना हो जाने पर गुमनाम मौत ने उनके मन मे इतना खौफ भर दिया कि वे पैदल ही अपने गांवों की ओर निकल पड़े। यहां राजनीति का सबसे गंदा चेहरा भी देखने को मिला कि राज्य सरकारों ने इस पलायन को रोकने की बजाय इसे एक प्रकार से प्रोत्साहित ही किया और लाखों मजदूर गांवों की ओर चल पड़े। 1947 जैसा दृश्य था। हजारों स्वयंसेवी संस्थाओं ने इनके लिए जगह जगह खाने पीने की व्यवस्था की, उनके अपने राज्यों की सरकारें भी आगे आईं कि उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाया जाए।

इसी प्रकार आवश्यक वस्तुओं का भी धीरे धीरे अभाव सा दिखने लगा था या यूं कहें कि अब स्थिति ये आ गयी थी कि जो भी ब्रांड उपलब्ध था उसी से काम चलाना था। अब आपकी पसंद नापसंद का कोई मायने नही रह गया था। इस बात से ये भी साबित हुआ कि जीवन मे कोई फर्क नही पड़ता कि आप किस साबुन से नहा रहे है और कौन सा शैम्पू लगा रहे हैं और ये सब मन के भ्रम ही थे। पर अगर इसकी तह में जाएं तो सच ये था कि कोरोना के भय से कल कारखाने बन्द हो गए थे तो उत्पादन लगभग ठप पड़ गया था। इसके अनेक दुष्परिणाम तत्काल दिखाई पड़ने लगे। सरकार की सारी गाइड लाइन्स को दरकिनार करते हुए निजी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को या तो निकालना शुरू कर दिया या उनका वेतन आधा कर दिया या कहीं कहीं तो रोक ही दिया। इससे समाज में भीतर ही भीतर एक वर्ग पैदा हो रहा था जो अब इस लॉक डाउन के विरोध में अपनी आवाज दबे ढके उठाने लगा।

सामाजिक दूरी और घर से न निकलने का भी लोगों के मानस पर बहुत बुरा असर पड़ रहा था। भय इतना व्याप्त था कि जिस पड़ोसी के घर दिन में एक बार हमारी बैठकी हो ही जाती थी उनके घर हम लोग अभी तक नही गए हैं। पत्नी का सामान्य दिनों में अपनी दोस्तों के साथ तीन चार घंटे बैठना ही सबसे बड़ा शगल था जो कि इन हालातों में संभव नही रह गया था। इन्ही दिनों वीडियो कॉलिंग हम लोगों का सहारा बनी। बच्चे जब वीडियो पर हाल चाल पूछते थे तो आंखों से आंसू रोकना मुश्किल हो जाता था। ये आंसू खुशी के थे या गम के ये समझ पाना मुश्किल था पर ये मन को हल्का जरूर कर जाते थे।

गिरती अर्थ व्यवस्था, कमतर होते रोजगार, दैनंदिन की कमाई से घर चलाने वालों की कतार पुकार ने सरकार को ये सोचने पर विवश कर दिया कि अब लॉक डाउन को लंबे समय तक नही खींचा जा सकता। हमारे प्रधानमंत्री लगातार परिस्थितियों पर नजर रखे हुए थे और सभी से लगातार सलाह मशविरा कर रहे थे। हम लोग भी अब कुछ छूट की उम्मीद कर रहे थे। अंततः तमाम बंदिशों के साथ अनलॉक 1 शुरू हुआ और ये उम्मीद बंधी कि इस एक अदृश्य से राक्षस, जिसने सारी मानवता को बंधक बना लिया था, से मुक्ति का मार्ग मिलेगा।

इस संस्मरण के लिखे जाने तक जन जीवन पटरी पर आना शुरू हो गया है। यद्यपि अभी वायरस से संक्रमित होने की गति पर अंकुश नही लगा है तथापि अब अधिकतर साधारण संक्रमित लोगों को उनके घर मे ही क्वारंटाइन किया जा रहा है तो सहज रूप से स्वस्थ होने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है और अस्पताल जाने का भय भी कम हुआ है। मैं कह सकता हूँ कि WHO को इस पर पूर्व में ही सोचना चाहिए था। अब तो रूस ने वैक्सीन बनाने का दावा भी कर दिया है और पहली खुराक रूस के राष्ट्रपति की बेटी को देकर शुरआत कर दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दो तीन महीनों में स्थिति काबू में आ जायेगी।

इस प्रकार हम दोनों पति पत्नी ने ईश्वर को समर्पण करते हुए और योग प्राणायाम और आयुर्वेद की अपनी बहुमूल्य धरोहर से अपने शरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रहा। सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देशों का पालन किया। कभी किसी चीज की कमी को लेकर कभी कोई तकरार नही की और प्रेम के साथ इस कठिन समय को पार किया। अगर तकलीफ हुई तो बहुत कुछ हासिल भी हुआ। पढ़ने और ध्यान के लिए पूरा वक्त मिला जो अभी भी बदस्तूर जारी है। इस दौरान जिन मित्रों, साथियों रिश्तेदारों ने फोन के माध्यम से, या व्यक्तिगत रूप से दवा पहुंचा कर हमारी हौसला अफजाई की उन सब को हम दोनों अपना प्रेमपूर्ण आभार व्यक्त करते हैं और सादर नमन करते हैं।।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥ ………..……………………………..शरद कबीर

Lock Down and Senior Citizen..Part4

I got retired from the services of KGSG Bank, an rural bank, in December 2019. I had various plans which I had been procrastinating for want of time. But when I got retired I only enjoyed the freedom for full two months. Being a banker in India, now-a-days, is no less than a nightmare, atleast if you are posted as branch manager. There is a very funny joke famous in banking community that if you ask, ‘if one women give birth a child in nine months then how much time will it take if there are nine women, the banker will answer, one month!! On the day of my retirement someone asked me that how I was feeling. ‘As soon as clock will ring 5 pm I will be a bird who has been freed from the cage’, was my prompt reply because banking scenario in India is very pathetic. All kind of experiments are going on. On one side government is trying to privatize them and on other side all the government financial plans are being implemented through banks only. Even all the monies released for poor people for their food in this Pandemic was to be distributed by banks only. So when I got retired I just enjoyed the freedom for first two months doing nothing.

My first plan was to improve my photography skill as soon as I have ample time in hand but by the end of March the whole world turned into a cage. Lockdown was imposed in almost every nook and corner of the world. So it became true that ‘man proposes god disposes’ in my case and I was compelled to stay at home to stay safe. But as we know every cloud has a silver lining so I tried to catch that silver lining. Now I had enough time to spend with my better half, rather quality time you may call it. Because just after the joining the bank my time was for bank only and after taking interest in Union activities my house had become a mere motel for me.

In response to my previous post Sunaina (Naina Banarasi) wrote that she was waiting for the love story of two elderly couple. Ha ha ha, but yes in so many ways it was a new phase of our life. In the helter and skelter of life how we reached at this age we could not know. Daughters were married and the son was in the job some 2000 kms away. We were lonely in a sense but we decided to start it afresh instead taking it as the end. We decided to have our morning tea, yoga & pranayan, lunch, evening tea and dinner together though there was no option left. Morning tea, after my walk alone on the roof, was our time when we enjoy morning tea and coffee in our verandah chit chatting over the news from news paper. But most of the time it turned into worries that if we came in contact with this so called deadly virus what will happen. The government machinery will pick us up and put at different location and so on and so forth. Later we found that this was not our thought only but a majority was thinking like this because we were reading about mis management in Covid19 centres. There we realized that why thousand of labours ran away from metro cities. They thought if death is inevitable why not die where they are with their kith and kins. In fact the scenes of hospital which we saw over tv was horrifying. All the staff clad in white PPE kits roaming and dead bodies rapped in black polythene. This kind of information not only staggered us but it was creating depression all over the world. We read few people committed suicide after they were tested corona positive. Almost all the government throughout the world did not take care that no such panic could emerge rather they also pour the oil to lit the fire. In India thousand of people were penalized monetarily as well as sentenced to jail if were found on roads. Crores of rupees were collected as fine from two and four wheel vehicle owners. This all was creating a fear psychosis among the people. In this situation we relied on Yoga and Pranayam to boost up our immunity as well as mental health. Just after tea we continued with our yoga session. To be continued……..

मित्रता दिवस

दोस्त, ये शब्द 70 की उम्र में आपको सात का बना देता है। बचपन में दोस्ती के मायने मालूम नही होते थे पर दोस्त का पता होता था। कुछ बड़े होने पर दोस्ती पर अंग्रेजी और हिंदी में जब निबंध लिखना शुरू किया तो बहुत सी परिभाषाएं ज्ञात हुईं जिसमें से एक अभी तक याद है, a friend in need is a friend indeed. और भी बहुत रही होंगी जो समय के साथ विस्मृत हो रही हैं। पर बचपन मे ये सिर्फ याद करके लिखने तक ही सीमित रहा। दोस्त बस दोस्त होते थे। मेरे साथ एक समस्या ये थी कि पिताजी का हर तीन साल पर स्थानांतरण हो जाता था तो जब तक कोई मैत्री प्रगाढ़ होती उसके पूर्व ही शहर छूट जाता था। फिर नौकरी पाने की जद्दोजहद में जिंदगी एक कमरे में किताबों और अखबारों में कैद हो गयी। बनारस में तब कोई परीक्षा नही होती थी सबसे नजदीकी सेंटर इलाहाबाद हुआ करता था फिर लखनऊ और दिल्ली। कितनी परीक्षाएं दी थी उस समय ये तो अब याद नही पर इतना याद है केवल सिविल सर्विसेज की मेन्स के अलावा कभी होटल में नही रुकना पड़ा। हर शहर में दोस्त जो मौजूद थे और हर घर में स्वागत था।
फेसबुक को चाहे जितना बुरा भला कहा गया हो पर इसने भी पुराने दोस्तों को मिलाने में अहम भूमिका निभाई और इसकी बदौलत बहुत से पुराने दोस्तों से आजकल हेलो हाय हो जाती है। फिर नौकरी में आ गए तो बहुत सहकर्मी मिले और उन्हीं में से कुछ को आज मित्र कह सकता हूँ और आलम ये है कि उनमें से कुछ मेरे बेटे की उम्र के भी हैं।
फेसबुक ने ही फोटोग्राफी की दुनियां के कुछ दिग्गजों से मिलवाया और आज वो सब अच्छे मित्र हैं और यही कारण है कि बैंक से सेवा निवृत्त होने के बाद भी जीवन मे जीवंतता न केवल बनी है बल्कि बढ़ गयी है। आज ही B. Sc. में साथ पढ़े एक मित्र का फोन आया और एक घंटे के लिए उम्र का पहिया 40 साल पीछे घूम गया। ऐसे दोस्तों के लिए कोई एक दिन मुकर्रर नही किया जा सकता पर हां इसी बहाने ही सही सब दोस्त याद आ जाते हैं।

बाद के वर्षों में दोस्ती के बहुत से उदाहरण पढ़े जिसमें कृष्ण और सुदामा का प्रसंग याद राह गया। दूसरों का उदाहरण क्या दूँ अपनी नौकरी के पहले आठ साल मैं अपने दोस्त के घर पर ही रहा। यहां मैं किसी दोस्त का नाम इसलिए नही दे रहा हूँ कि अगर कोई नाम छूट गया तो कितनी गालियां सुनने को मिलेगी इसका अंदाज नही लगाया जा सकता।

आज इस मौके पर उन सभी मित्रों को याद करते हुए आनंद आ रहा है जिन्होंने बुरी आदतें सिखाईं उनका बड़ा अहसान है मुझ पर उन सभी को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं। उन मित्रों को जो बुरे वक्त में मेरे साथ खड़े थे ये कहते हुए कि अबे फिकर क्यों करता है मैं हूँ न! उनको बहुत सी प्रेम भरी गालियां।

Create your website with WordPress.com
Get started